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दिया तले अंधेरा”: मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना में नियमों की अनदेखी, बैकुण्ठपुर नगर पालिका कर्मचारी व पार्षदों पर उठे सवाल

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कोरिया/छत्तीसगढ़।बैकुण्ठपुर-छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना, जिसे गरीब, जरूरतमंद और असहाय नागरिकों के लिए शुरू किया गया था, अब बैकुण्ठपुर नगर पालिका क्षेत्र में नियमों की अनदेखी और दुरुपयोग के आरोपों में घिरती नजर आ रही है। सूत्रो से जानकारी सामने आ रही है कि इस योजना का लाभ नगर पालिका के कर्मचारी एवं जनप्रतिनिधि (पार्षद) भी उठा रहे हैं, जबकि वे नियमों के अनुसार इस योजना के लिए स्पष्ट रूप से अपात्र हैं। योजना का उद्देश्य ऐसे नागरिकों को तीर्थ यात्रा का अवसर देना है, जो आर्थिक तंगी के कारण जीवन में कभी तीर्थ दर्शन नहीं कर पाते। लेकिन बैकुण्ठपुर में जिस तरह से पात्रता के दायरे से बाहर के लोग सूची में शामिल किए गए हैं, उससे “दिया तले अंधेरा” वाली कहावत चरितार्थ होती नजर आ रही है।
योजना के नियम क्या कहते हैं
सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना में वही व्यक्ति पात्र है—
जो छत्तीसगढ़ का स्थायी निवासी हो
जो गरीबी रेखा के नीचे (BPL) या राज्य द्वारा निर्धारित कम आय वर्ग में आता हो
सामान्यतः 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का वरिष्ठ नागरिक
विधवा, दिव्यांग, अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के जरूरतमंद लोगों को प्राथमिकता

कौन हैं अपात्र नियमों के तहत—

नगर पंचायत/नगर पालिका/नगर निगम के पार्षद
पंचायत, जनपद, जिला स्तर के जनप्रतिनिधि
शासकीय, अर्द्धशासकीय, निगम-मंडल के सेवारत व सेवानिवृत्त कर्मचारी, पेंशनधारी शासकीय कर्मी इन सभी को योजना से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है।फिर कैसे उठा रहे लाभ?
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि प्रभाव और पहुंच के चलते कुछ कर्मचारियों व पार्षदों के नाम सूची में शामिल कर लिए गए। चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता न होने के कारण वास्तविक जरूरतमंदों को बाहर कर दिया गया और नियमों को ताक पर रखकर अपात्रों को लाभ दे दिया गया।
क्या हो सकती है कार्यवाही
यदि जांच में नियम उल्लंघन की पुष्टि होती है तो
अपात्र लाभार्थियों से पूरी राशि की वसूली
संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई गंभीर मामलों में प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाई चयन समिति की भूमिका की भी जांच संभव
यह मामला न केवल योजना की मंशा पर सवाल खड़े करता है, बल्कि प्रशासनिक ईमानदारी पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण पर क्या संज्ञान लेता है और क्या वास्तव में जरूरतमंदों को उनका हक मिल पाएगा या “दिया तले अंधेरा” यूं ही बना रहेगा।
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